
दमोह।
बुंदेलखंड मैं लोक कला की जड़े बहुत गहरी हैं। सैकड़ो वर्षों से चली आ रही परंपराएं आज भी पूरी शिद्दत के साथ निभाई जा रही हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं बुंदेलखंड के प्रसिद्ध लोक नृत्य दिवाली की। दीपावली के दूसरे दिन शुक्ल पक्ष की प्रथमा को जिले भर में बरेदी (ग्वाल) अपनी वेशभूषा में तैयार होकर नगड़िया और ढोल की थाप पर नाचते गाते हुए गली-गली में घूमते हैं। ग्रामीण अंचलों के अलावा शहरी क्षेत्र में भी यह दिवाली नृत्य देखा जा सकता है। इस नृत्य के प्रति लोगों की दीवानगी अभी भी ऐसी है कि जहां नृत्य होता है वहां पर देखते ही देखते सैकड़ो लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता है। ऐसी मान्यता है कि यह नृत्य करीब 5000 साल पुराना है। किंवदंती के अनुसार जब भगवान श्री कृष्णा ग्वाल के रूप में वृंदावन में रहा करते थे तब उनकी गायों को इंद्र चुरा कर ले गए। अपनी गायों को खोजने के लिए भगवान कृष्ण ने अपने सखा ग्वाल साथियों के साथ ऊनी वस्त्रो का मनमोहक श्रृंगार किया, ढोल नगड़िया और बांसुरी बजाते हुए जंगल-जंगल में गायों को ढूंढने लगे। जब गायें भगवान कृष्ण की बंसी की आवाज सुनती तो वह दौड़कर उनके पास आ जाती। इस तरह दीपावली की रात से शुरू हुआ यह लोक नृत्य दोज और पंचमी और कहीं कहीं 15 दिन तक चलता है। कहते हैं कि उस समय से यह परंपरा चली आ रही है और अभी भी लोग उसे परंपरा का निर्वाह करने के लिए लाल, हरे, चमकीली झालर वाले ऊनी कपड़े पहनते हैं। पैरों में घुंघरू बांधकर नाचते हुए ढोल और नगड़िया बजाकर बजाकर अपनी गायों को ढूंढने का प्रयत्न करते हैं। जब यह ग्वाल नाचते गांव और गलियों में पहुंचते हैं तो लोग इन्हें प्रसाद देकर जलपान कराते हैं। लोग इनाम के स्वरूप कुछ राशि भी देते हैं। इस परंपरा का निर्वाह करने की पीछे एक कारण यह भी है कि गांव का तेजी से होता शहरीकरण और कम होता पशुधन है। इसको बचाने के लिए उनके संवर्धन के लिए इस नृत्य के माध्यम से अलख जगाई जाती है। श्याम लाल यादव कहते हैं कि भगवान श्री कृष्णा के लिए यह नृत्य किया जाता है इसमें ग्वाल और बाल दोनों को तैयार करके बड़ी शिद्दत से नृत्य किया जाता है। गांव-गांव में हम लोग घूमते हैं। करीब 15 दिन तक यह चलता है। पुरखों की समय से चली आ रही इस परंपरा का हम निर्वाह कर रहे हैं। दमोह जिले के बटियागढ़, जबेरा, हटा, तेंदूखेड़ा, पथरिया सहित सभी ग्रामीण अंचलों तथा शहर में भी इसकी धूम देखी जा रही है।

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