
दमोह। मतदान की तारीख नजदीक आते ही जनसंपर्क भी तेज हो गया है. जोड़-तोड़ और तोड़फोड़ भी तेजी से चल रही है. किसको कितना फायदा मिलेगा समझते हैं इस विश्लेषण से.
जैसे जैसे मतदान की तारीख नजदीक आती जा रही है वैसे ही प्रत्याशियों का जनसंपर्क भी तेज होता जा रहा है. वैसे तो मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा में है लेकिन आम आदमी पार्टी और बसपा भी अपनी जीत का दावा कर रही है. उसके बाद भी मुकाबला त्रिकोणीय नहीं है. ताजा जनसंपर्क और समर्थन की बात करें तो कांग्रेस प्रत्याशी अजय टंडन भाजपा के लिए रोज नित नई परेशानियां खड़ी कर रहे हैं. हाल ही के दिनों में भाजपा से टूट कर आए कार्यकर्ताओं की संख्या दर्जन नहीं बल्कि सैकड़ो में है. एक के बाद एक दमदार नेता भाजपा का साथ छोड़कर जा रहे हैं. जिससे भाजपा के लिए आने वाले दिनों में और भी मुश्किल है खड़ी हो सकती हैं. इसके अलावा भीतर घात से जूझ रही भाजपा के लिए अपनों से निपटना ही सबसे बड़ी चुनौती है. सबसे पहले क्षेत्र के कुर्मी समाज के दिग्गज नेता और पूर्व जिला पंचायत सदस्य प्रहलाद पटेल के खास माने जाने वाले शिवचरण पटेल ने भाजपा को अलविदा कह दिया. इसके बाद पूर्व जनपद अध्यक्ष आलोक अहिरवार ने भी भाजपा का साथ छोड़ दिया. इतना ही नहीं जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दमोह विधानसभा की एक छोर पर जिस समय सभा को संबोधित कर रहे थे उसी समय भाजपा के अभाना मंडल अध्यक्ष और कुशवाहा समाज के बड़े नेता अपनी 200 से ज्यादा समर्थकों के साथ भाजपा को अलविदा कहकर कांग्रेस में शामिल हो गए. इसकी साथ ही सबसे बड़ी मुसीबत तो शहरी क्षेत्र के अंदर ही भाजपा को पेश आ रही है. दरअसल भाजपा से निष्कासित होने के बाद पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा के प्रत्याशी जयंत मलैया के बेटे सिद्धार्थ मलैया ने टीम सिद्धार्थ मलैया का गठन कर 39 में से 37 वार्डो पर अपने प्रत्याशी उतार दिए थे. यह बात अलग है कि उन्हें केवल पांच सीटों पर सफलता मिली. लेकिन उनके कारण भाजपा के 10 से ज्यादा उम्मीदवारों को बहुत ही काम मतों से शिकस्त मिली और वह पार्षद बनने से वंचित रह गए. जिला पंचायत के चुनाव में अभी इन्होंने अपना प्रत्याशी उतार कर भाजपा को सत्ता से दूर कर दिया था इस तरह नगर पालिका और जिला पंचायत दोनों ही जगह है भाजपा सत्ता में आने से चूक गई . जिसके कारण अब वही लोग ताक में बैठे हैं कि कब मौका मिले और वह अपना हिसाब बराबर कर लें. हालांकि जयंत मलैया सभी से व्यक्तिगत मिलकर उन्हें समझाइश दे रहे हैं. लेकिन यह समझाइश कितना काम आती है चुनाव परिणाम से पता चलेगा. एक नई मुसीबत भाजपा ने जो बैठे-बैठे मोल ले ली है, उसी के कारण पिछली बार भाजपा को दमोह और पथरिया दोनों ही सीटों से हार का सामना करना पड़ा था और उस मुसीबत का नाम कुर्मी समाज के दिग्गज नेता पूर्व सांसद और पूर्व मंत्री डॉक्टर रामकृष्ण कुसमरिया है. दरअसल जब जिला भाजपा ने प्रधानमंत्री मोदी की सभा में मंच पर बैठने के लिए एसपीजी को नाम की सूची अप्रूवल के लिए भेजी तो उस सूची में बाबा जी का नाम कहीं पर नहीं था. लिहाजा बाबा को मंच पर स्थान नहीं मिला. वह एक आम कार्य कर्ता की तरह जनता के बीच बैठे रहे. इस बात से खफा बाबा के समर्थकों ने सभा के अंत में अपना विरोध प्रदर्शित कर दिया था. संभव है कि बाबा भले ही उस वक्त अपमान का घूंट पीकर रह गए हो लेकिन उनकी इस नाराजगी का असर कहीं न कहीं परिणाम पर दिखेगा. इसके विपरीत भाजपा की खाते में मात्र एक उपलब्धि कह सकते हैं और वह यह है कि आज ही आम आदमी पार्टी के जिला अध्यक्ष अभिनव गौतम ने पार्टी से इस्तीफा देकर भाजपा का हाथ पकड़ लिया. हालांकि अभिनव गौतम अभी राजनीति में नए हैं और कुछ समय पहले ही वह जिला अध्यक्ष बने थे. इसलिए उनकी इतनी पकड़ भी नहीं है कि वह भाजपा का कुछ विशेष फायदा करा सके. यह बात अलग है कि उनके साथ कुछ और लोग भी भाजपा में शामिल हो गए .

सेंधमारी की यह प्रक्रिया लगातार जारी है. लेकिन इस सेंधमारी से किसको कितना फायदा होगा फिलहाल कहना मुश्किल है. लेकिन जातीय समीकरण के हिसाब से इस बार भाजपा के लिए कुछ शुभ संकेत नहीं हैं. इसका एक उदाहरण गिरनार जी भी है. जिसके चलते जब जैन समुदाय के कुछ लोगों ने ब्राह्मण समाज को आपत्तिजनक शब्द लिखे तो ब्राह्मणों ने भी भाजपा के खिलाफ गोल बंद होना शुरू कर दिया. अभी तक ब्राह्मण समाज का वोट बीजेपी का सबसे पक्का वोट बैंक माना जाता था लेकिन गिरनार जी के कारण अब वहीं भाजपा से निकलता हुआ दिख रहा है. लोधी और कुर्मी समाज के लोग तो वैसे ही नाराज हैं.

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