मार्च 17, 2026

यह कैसे पूर्व शिक्षा मंत्री हैं जिन्हें पाठ्यक्रम के अध्याय और प्रार्थना में अंतर नहीं पता !

दमोह. 2 दिन पहले पूर्व मंत्री एवं एक पत्रकार के बीच हुई सवाल जवाब और टीका टिप्पणी के बाद अब पूर्व मंत्री की पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. समझते हैं इन वायरल पोस्ट का सच. 

    मध्य प्रदेश कांग्रेस के कद्दावर नेता, पूर्व मंत्री एवं मीडिया विभाग के प्रमुख मुकेश नायक ने 2 दिन पहले अपने निवास पर एक वार्ता का आयोजन किया था. जिसमें उन्होंने गंगा जमुना संस्थान एवं डॉक्टर अजय लाल द्वारा संचालित मिशन अस्पताल एवं उनकी संस्थाओं को लेकर सरकार पर सवाल खड़े किए थे. सवाल जवाब के इस दौर में एक मुद्दा यही भी था क्या किसी भी निजी स्कूल में अभिभावकों की सहमति के बगैर कोई भी धर्म विशेष या ऐसी प्रार्थना करवाई जा सकती है जो उचित न हो. इस पर पूर्व मंत्री ने संबंधित पत्रकार को चुनौती दी थी कि यदि वह गलत साबित हुए तो राजनीति छोड़ देंगे और पत्रकार यदि गलत साबित होता है तो इस पत्रकारिता छोड़ना होगी. इसके दूसरे ही दिन पूर्व मंत्री श्री नायक ने कांग्रेस के मीडिया ग्रुप में एक किताब उर्दू भारती कक्षा पांचवी के अंश प्रस्तुत किए और “लव पर आती है दुआ” एक उर्दू कविता का हिंदी तर्जुमा कर कर उसे पेश किया. जिसमें यह बताया गया कि इस मध्य प्रदेश शासन से मान्यता प्राप्त है. अब पत्रकार को पत्रकारिता छोड़ देना चाहिए ? तो हम आपको बताते हैं पूरा सच. सवाल यह था कि क्या स्कूल में धर्म विशेष या अभिभावकों की स्वीकृति के बगैर कोई भी प्रार्थना कराई जा सकती है ? लेकिन श्री नायक ने इस प्रार्थना को सिलेबस की एक किताब का हिस्सा समझकर उसे प्रचारित करना शुरू कर दिया. श्री नायक विद्वान हैं, राम कथा वाचक भी रहे हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि वह उसी शिक्षा विभाग के कई वर्षों तक मंत्री भी रहे हैं. ऐसे में क्या उन्हें प्रार्थना और किसी सिलेबस की एक किताब के एक पाठ या कविता में अंतर पता नहीं है. बात प्रार्थना की हो रही थी जो की कक्षाएं शुरू होने से पहले सामूहिक रूप से सभी बच्चों को कराई जाती है. जबकि सिलेबस किसी कक्षा की किताबों का पूरा समूह होता है. और उसमें पढ़ाए जाने वाले विषयों के अध्याय अलग होते हैं. इसे ऐसा समझकर की “लव पर आती है दुआ” एक कविता है और वह किसी पाठ का हिस्सा है. इसी तरह “चल रे मटके टम्मक टू” किसी पाठ की कविता का हिस्सा है. तो श्री नायक के अनुसार यह कविता भी क्या प्रार्थना हो गई ? प्रार्थना स्कूल संचालित रहने पर पूरे सत्र तक दोहराई जाती है. यदि एक बच्चा किसी स्कूल में पांच या दस साल तक पढ़ता है तो वह लगातार उतने वर्षों तक उस प्रार्थना को करता है. जबकि कोई सिलेबस या उसके अध्याय या कविताएं मात्र एक कक्षा में पढ़ाई जाती हैं. जो की मुश्किल से साल में एक बार, दो बार या तीन बार ही पढ़ाई जाती हैं ताकि उनका रिवीजन हो सके. श्री नायक को यह समझना चाहिए की प्रार्थना और सिलेबस के किसी अध्याय में जमीन आसमान का अंतर होता है. यह बात पूरी तरह गले नहीं उतरती कि श्री नायक को प्रार्थना और सिलेबस के किसी अध्याय की जानकारी न हो. वह शिक्षा मंत्री रहे हैं विद्वान व्यक्ति है. उन्हें इसकी जानकारी भी होगी. लेकिन अब वह गलत साबित हो रहे हैं इसलिए सोशल मीडिया का सहारा लेकर पत्रकार को ही गलत साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. यदि उन्हें लगता है कि वह अभी भी सही है तो जिस समय पत्रकार वार्ता चल रही थी उन्हीं के एक समर्थक या परिवार के सदस्य जो पूरी वार्ता की रिकॉर्डिंग कर रहे थे वह उसे वीडियो को अच्छी तरह से बार-बार देख और सुन सकते हैं. ताकि उनकी गलतफहमी दूर हो जाए. किसी इतने बड़े कद के नेता की कुंठा छुपाने का यह कुत्सित प्रयास किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता. श्री नायक को अपनी गलती मान लेना चाहिए. संबंधित पत्रकार भी यह नहीं कहता कि आप राजनीति छोड़ दें. क्योंकि पत्रकार की मानसिकता आपकी तरह छोटी नहीं है. आप राजनीति करें, लेकिन स्वच्छ राजनीति करें. क्योंकि इस लोकतंत्र में विपक्ष की बहुत बड़ी भूमिका और महती आवश्यकता है. किसी के सवालों से इतने उत्तेजित न हो कि उसे व्यक्तिगत मान लिया जाए. सवाल पूछना पत्रकारों का कर्म और धर्म दोनों है. जवाब देना नेताओं का धर्म है. उन्हें कुंठित होकर अपने झूठ को छुपाने के लिए इस तरह का दुष्प्रचार करना शोभा नहीं देता है. एक बात का उल्लेख करना यहां आवश्यक है कि जब तक पूर्व मंत्री बोलते रहे तब तक सभी लोगों ने पूरी शालीनता और शिद्दत के साथ उनकी बात सुनी. बीच में टीका टिप्पणी नहीं की. अपनी बात खत्म करने के बाद उन्होंने ही आग्रह किया था कि किसी का सवाल हो तो वह पूछ सकते हैं. जब सवालों की बारी आई तो आप बौखला गए.

पूर्व मंत्री ने अपनी प्रेस वार्ता में प्रदेश के पंचायत मंत्री को बदमिजाज, अहंकारी कहकर संबोधित किया था. और भी कई अन्य रूप लगाए थे. जरा पूर्व मंत्री अपने ही बयान को देख सुन ले क्या उनका आचरण भी ठीक वैसा ही है जैसा उनका बयान है. पर यदि उनका आचरण बयान की तरह है तो फिर तो उन्हें आत्म विश्लेषण करने की बहुत ही अधिक आवश्यकता है. 

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