मार्च 17, 2026

फर्जीवाड़े के तहत की गई तीनों नियुक्तियों को न्यायालय ने किया निरस्त

दमोह. दिव्यांग पुनर्वास केंद्र में फर्जीवाड़े के तहत की गई तीन नियुक्तियों को न्यायालय आयुक्त नि:शक्तजन ने निरस्त कर दिया है. साथ ही अपने आदेश में तीनों कर्मचारियों के विरुद्ध पुलिस प्राथमिकी दर्ज किए जाने के भी निर्देश दिए हैं.
सामाजिक न्याय एवं दिव्यांग सशक्तिकरण विभाग के अंतर्गत संचालित दिव्यांग पुनर्वास केंद्र में फर्जीवाड़े के तहत की गई तीन नियुक्तियों को न्यायालय आयुक्त नि:शक्तजन ने निरस्त कर दिया है. न्यायालय ने अपने आदेश में नियुक्तियों को निरस्त करने के साथ ही 45 दिन के भीतर रिक्त पदों को विधिवत भरने तथा मामले में दोषी कर्मचारियों पर पुलिस प्राथमिकी दर्ज किए जाने के भी निर्देश दिए हैं. गौरतलब है कि दिव्यांग पुनर्वास केंद्र में वर्ष 2006 से फिजियोथैरेपिस्ट डॉक्टर रियाज कुरैशी, लेखपाल धर्मेंद्र परिहार एवं अटेंडर प्रदीप नामदेव नियम विरुद्ध तरीके से बिना नियुक्ति एवं बिना संविदा आधार के पिछले 18 वर्षों से नौकरी कर रहे थे. साथ ही वह वेतन के साथ अन्य सुविधाओं का लाभ ले रहे थे. इस मामले को हमने प्रमुखता से उठाया था. इसके बाद कलेक्टर सुधीर कुमार कोचर ने लंबित पड़ी जांच को पूरा करने के निर्देश जांच कमेटी को दिए थे. इसके बाद 15 दिन की भीतर मामले की जांच आयुक्त न्यायालय नि:शक्तजन भोपाल को भेज दी गई. इसके बाद जांच प्रतिवेदन का परीक्षण करने के उपरांत न्यायालय ने कर्मचारियों की नियुक्तियों को अवैधानिक मानते हुए उन्हें निरस्त कर दिया है. उधर तीनों ही आरोपित कर्मचारियों ने राहत पाने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से इस बात का उल्लेख किया है की उक्त तीनों कर्मचारी नियम विरुद्ध तरीके से नौकरी कर रहे थे तथा 18 वर्षों से वेतन का आहरण भी कर रहे थे. जबकि संविदा अथवा नियमितीकरण से संबंधित कोई भी नियुक्ति आदेश तीनों कर्मचारियों के पास नहीं थे और न ही इनसे संबंधित कोई भी दस्तावेज विभाग में मौजूद हैं. न्यायालय ने इस बात पर भी सवाल उठाए हैं की जब तीनों कर्मचारियों के कोई दस्तावेज विभाग में मौजूद नहीं हैं तो आखिर यह तीनों इतनी लंबी अवधि तक आखिर कैसे वेतन लेते रहे ? क्या यह सारे मामले तत्कालीन अधिकारियों के संज्ञान में नहीं आए ? इस मामले में यह बात स्पष्ट है कि बगैर विभागीय कर्मचारी और अधिकारियों की मिलीभगत के यह संभव नहीं है. न्यायालय ने तत्काल प्रभाव से तीनों कर्मचारियों से प्रभार लेकर उनके प्रभार दूसरे कर्मचारियों को सौंपने के आदेश दिए हैं, ताकि विभाग के अन्य सभी अधिकारी कर्मचारी कर्मचारियों के वेतन आदि का निराकरण समय पर किया जा सके तथा विभागीय कार्य निर्वाध रूप से चल सकें. जांच कमेटी ने बीती 15 मई को यह रिपोर्ट जिला प्रशासन को सौंपी थी. तब से लेकर अभी तक तीनों कर्मचारियों ने अपने प्रभार संबंधित दूसरे कर्मचारियों को नहीं सौंपे हैं. इसके अलावा विभागों की अलमारी की चाबियां लेखपाल और फिजियोथैरेपिस्ट के पास हैं. जिसके कारण कोई दूसरे कार्य भी नहीं हो पा रहे हैं. ताज्जुब की बात है जिला प्रशासन ने भी इस मामले में अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है. बीती 4 जून को न्यायालय ने अपना आदेश जारी किया था. लेकिन अभी तक इन तीनों कर्मचारियों के विरुद्ध जिला प्रशासन ने पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने के लिए लेख नहीं किया है. इससे स्पष्ट होता है कि कहीं न कहीं संबंधित विभाग के आला अधिकारियों की मिली भगत पूरे मामले में हो सकती है? एक विभागीय अधिकारी का यह भी कहना है कि यदि इन तीनों आरोपित कर्मचारियों पर पुलिस प्राथमिकी दर्ज हो जाती है तो उनसे 18 वर्षों के वेतन की वसूली का रास्ता भी खुल जाएगा. इसके अलावा पूर्व के सभी संबंधित दोषी अधिकारी कर्मचारियों पर भी न्यायालय का शिकंजा कर सकेगा.

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