
दमोह। कांग्रेस का टिकट वितरण जातियों के फेर में उलझ गया है। कांग्रेस ने जिस जाति पर सबसे ज्यादा भरोसा जताया इसके नेता पलटी मार गए। बावजूद इसके कांग्रेस ने कोई सबक नहीं लिया।
दमोह जिले में कांग्रेस की रणनीति भी बड़ी अजीब है। कांग्रेस कब क्या फैसला ले और उसे वह आत्मघाती साबित हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता? बावजूद इसके कांग्रेस बार-बार अपनी फैसलों को दोहराने के लिए यहां पर प्रसिद्ध हो गई है। दरअसल हम बात कर रहे हैं कांग्रेस पार्टी से अब तक जाति विशेष के लिए दिए गए टिकट और उन नेताओं के पाला बदलने की। हाल ही में बिहार में जातिगत जनगणना होने के बाद कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने यह बयान दिया कि यदि प्रदेश में उनकी सरकार बनती है तो वह मध्य प्रदेश में भी जातिगत जनगणना कराएंगे। दरअसल उनका यह बयान यूं ही नहीं आया। इस बयान के पीछे कांग्रेस की मनसा क्या है यह साफ झलक रही है? पूरे प्रदेश में सबसे ज्यादा संख्या ओबीसी मतदाताओं की है। उनमें भी कई सीटों पर लोधी मतदाता निर्णायक भूमिका हैं। ऐसे में यदि कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा लोधियों को टिकट दे रही है, तो इसमें वह अपनी जीत देख रही है। लेकिन जिन लोधियों पर कांग्रेस इस समय भरोसा कर रही है वही लोधी कांग्रेस को पहले कई बार आइना दिखा चुके हैं। दमोह जिले में कांग्रेस के राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालें तो पार्टी ने 5 लोधियों को 11 बार टिकट दिया जिसमें से चार ने पलटी मार कर विपक्षी दल का दामन थाम लिया। इतना ही नहीं समय के साथ यह फिर से वापस अपनी पार्टी में आए। पार्टी ने इन्हें फिर टिकट देकर इनका मान बढ़ाया लेकिन यह पार्टी की काम न आ सके।
तिलक का तिलक काम न आया
सबसे पहले हम बात करें तो तिलक सिंह को 1999 में कांग्रेस ने लोकसभा का टिकट दिया था। लेकिन उसमें उन्हें करारी हार मिली। इसके बाद 2004 में उन्हें फिर से लोकसभा का टिकट दिया गया। लेकिन इस बार भी उन्हें हर का सामना करना पड़ा। यह चुनाव उन्हें चंद्रभान सिंह ने हराया था। 2004 में हर का सामना करने के बाद तिलक सिंह ने कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। लेकिन वहां पर ज्यादा पूछ परख न होने की चलते कुछ समय बाद ही वह कांग्रेस में वापस लौट आए। इसके बाद कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर उन पर भरोसा जताया और 2013 में बड़ा मलहरा विधानसभा से अपना उम्मीदवार बनाया। लेकिन किस्मत ने उनके साथ नहीं दिया और बहुत ही अल्पमतों से वह चुनाव हार गए। उन्हें रेखा यादव ने चुनाव हराया था।
तीन बार दिया मौका
इसी तरह इसके बाद 2008 में अविश्वास प्रस्ताव के दरमियान कांग्रेस के पक्ष में वोटिंग करने वाले भाजपा सांसद चंद्रभान सिंह सुर्खियों में आए थे। पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया था। जिससे नाराज होकर उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया और कांग्रेस ने उन पर भरोसा जताते हुए 2008 में दमोह विधानसभा का उम्मीदवार बनाया था। लेकिन भाजपा के कद्दावर नेता जयंत मलैया से वह चुनाव हार गए। इसके बाद कमलनाथ की जिद के कारण उन्हें एक बार फिर से 2009 में दमोह लोकसभा से उम्मीदवार बनाया गया। लेकिन इस बार भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा। पार्टी ने तीसरी बार उन्हें फिर से 2013 में दमोह विधानसभा से मैदान में उतारा लेकिन खराब किस्मत के चलते वह एक बार फिर से जयंत मलैया के हाथों पराजित हो गए। इसके बाद उन्होंने एक बार फिर कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया, और अब वह जबेरा विधानसभा के हर्रई क्षेत्र से जिला पंचायत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। साथ ही वह विधानसभा के लिए भी दावेदारी जाता रहे हैं।
दोनों भाइयों ने छोड़ा साथ
2018 में कांग्रेस ने एक बार फिर लोधियों पर भरोसा जताया। कांग्रेस ने एक ही परिवार की दो सगे चचेरे भाइयों राहुल सिंह को दमोह तथा प्रदुम्न सिंह को बड़ा मलहरा से अपना उम्मीदवार बनाया। दोनों ही भाई अपनी अपनी विधानसभा से विजयी हुए। राहुल भाजपा के पूर्व मंत्री एवं कद्दावर नेता जयंत मलैया को काफी कम मतों से हराकर विधानसभा पहुंचे और मुख्यमंत्री कमलनाथ की हिट लिस्ट में शामिल हुए। लेकिन सरकार बदलते ही दोनों भाइयों ने कांग्रेस को छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। जिसमें भाजपा ने दोनों ही भाइयों को अपनी-अपनी विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिया। प्रदुम्न सिंह दूसरी बार फिर निर्वाचित हो गए लेकिन राहुल सिंह को कांग्रेस नेता अजय टंडन ने उपचुनाव में भारी मतों से शिकस्त देकर लगभग उनका राजनीतिक करियर चौपट कर दिया।
प्रताप को मिला ईमान का इनाम
इसी तरह कभी पूर्व मंत्री दिवंगत नेता रत्नेश सालोमान के खासमखास रहे प्रताप सिंह को कांग्रेस ने 2013 में जबेरा विधानसभा से अपना उम्मीदवार बनाया। वह पार्टी की उम्मीद पर खरे उतरे और उन्होंने भाजपा प्रत्याशी पूर्व मंत्री दशरथ सिंह को चुनाव हार दिया। इसके बाद 2018 में कांग्रेस ने उन्हें फिर से अपना प्रत्याशी बनाया। लेकिन रत्नेश सालोमन के बेटे आदित्य सालोमन की बगावत के कारण वह चुनाव हार गए। दो चुनाव हारने के बाद भी कांग्रेस ने तीसरी बार फिर उन पर भरोसा जताया और लोकसभा का 2019 में टिकट दिया। लेकिन इस बार मोदी लहर के कारण वह भाजपा के दिग्गज नेता प्रहलाद पटेल से चुनाव हार गए।
फिर भी नहीं लिया सबक
कहते हैं कि दूध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर पीता है। लेकिन कांग्रेस ने इससे कोई सबक नहीं लिया। 2018 में राव बृजेंद्र सिंह के कारण कांग्रेस को बुरी तरह पथरिया विधानसभा में हार का सामना करना पड़ा था। राव बृजेंद्र सिंह निर्दलीय चुनाव लड़े थे और तीसरे नंबर पर आए थे। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी गौरव पटेल को मात्र 25000 मत मिले थे और वह चौथे नंबर पर पहुंच गए थे। इसे राजनीति की मजबूरियां कहें या कुछ और की कांग्रेस ने हार के डर से राव बृजेंद्र सिंह पर इस बार पथरिया से दाव लगाया है। वहीं दो चुनाव हार चुके प्रताप सिंह पर जबेरा विधानसभा से तीसरी बार दाव लगाया है। दमोह जिले में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी पार्टी ने एक ही जाति के दो उम्मीदवारों को टिकट दिया है। अन्यथा इसके पहले हमेशा इस फैक्टर का ध्यान रखा जाता था कि एक जाति के व्यक्ति को एक जगह से टिकट दी जाए और उसमें भी इस बात पर विशेष जोर दिया जाता था कि जो जाति जहां बहुसंख्यक है उस जाति के नेता पर दाव लगाया जाता था। लेकिन अब जबकि देश में जातिगत जनगणना की एक नई हवा चलना शुरू हुई है तब कांग्रेस भी अब जातियों की फिर में उलझ गई है।

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