दमोह। इंसान को ना जीते जी सुख है न मौत के बाद चैन। मरने के बाद भी परिजनों को करना पड़ती है जद्दोजहद। जी हां हम बात कर रहे हैं सागर जिले की बीना तहसील के पाली गांव की। यहां पर मरने के बाद भी इंसान की अस्थियांऔर राख बचाने के लिए परिजनों को जद्दोजहद करना पड़ती है। ताजा मामला हाल ही में सामने आया है। यहां 70 वर्षीय मुन्नालाल अहिरवार की मौत हो गई। परिजन और ग्रामीण उसका शव लेकर श्मशान घाट पहुंचे वहां पर जैसे ही चिता को अग्नि दी तो एकदम से बारिश शुरू हो गई। चिता ठंडी न पड़ जाए यह सोच कर अपने साथ लाए हुए छाता लोगों ने खोल दिए और चिता से कुछ ऊपर करके खड़े हो गए ताकि उसको बुझने से बचाया जा सके। इसी दौरान परिजन दौड़कर घर तक गए और किसी तरह एक टीन की व्यवस्था कर ले आए और उसे लकड़ियों के सहारे चिता के ऊपर रख दिया। ताकि मृतक का संस्कार अच्छे से हो जाए। ग्रामीण बताते हैं कि सरकार कितने ही विकास के दावे और वादे कर ले लेकिन हमारे गांव की हकीकत से वह मुकर नहीं पाएंगे। यहां पर जब भी बारिश के दौरान किसी की मौत होती है तो उसका अंतिम संस्कार कुछ ऐसे ही तरीके से करना पड़ता है। अन्यथा मुर्दा जलने के बात यदि पानी गिरता है तो राख और अस्थियां तक उस पानी में बह जाती हैं। यहां के पूर्व सरपंच कहते हैं कि 3:00 से 8:00 बनाने का प्रयास किया गया लेकिन राजनीतिक दखल के कारण उसका काम शुरू नहीं हो सका। उस पर आसपास की कॉलोनी वाले भी विरोध करते हैं।
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