
दमोह। न्यायालय ने आठ वर्ष पूर्व एक महिला को जलाकर मारने वाले पति और जेठानी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। मामला तेजगढ़ थाना क्षेत्र का है।
अपर सत्र न्यायाधीश डॉ. आरती शुक्ला पांडेय ने एक महिला को मिट्टी का तेल डालकर जलाकर मार डालने के मामले में आरोपी पति एवं जेठानी के विरुद्ध मामला प्रमाणित मानते हुए भादवि की धारा 302 में आजीवन कारावास से दंडित किया है। मामले में शासन की ओर से पैरवी शासकीय अभिभाषक राजीव बद्री सिंह ठाकुर द्वारा ने की। अभियोजन के अनुसर 13 मई 2015 को एक महिला जो लगभग 40 प्रतिशत जली हुई अवस्था में जिला चिकित्सालय दमोह में भर्ती कराया गया। महिला की गंभीर हालत को देखते हुए उसे चिकित्सक ने जबलपुर मेडिकल कॉलेज रैफर कर दिया गया। एमएलसी जांच के दौरान प्रधान आरक्षक रामसुजान उपाध्याय ने तत्काल वार्ड में पहुंचकर जली हुई महिला के कथन लिए। महिला ने बताया कि उसका नाम रेखा लोधी है। उसकी ससुराल थाना तेजगढ़ के अंतर्गत आने वाले ग्राम देवरी लीलाधर में है। आज दोपहर के समय उसकी जेठानी लीलाबाई एवं पति मोहन लोधी ने उसके साथ विवाद किया और विवाद के दौरान जेठानी लीलाबाई ने उसके हाथ पकड़ लिए एवं पति मोहन लोधी ने जान से मारने की के आशय से उसके ऊपर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी। आग लगाने के बाद पति बचाने लगा तो उसके हाथ भी जल गए। बयान के बाद महिला जबलपुर रैफर हो गई। महिला की गंभीर हालत देखकर मेडिकल कॉलेज के चिकित्सक ने भी उसके बयान लिए। बयान में उसने पति एवं जेठानी के द्वारा मिट्टी का तेल डालकर आग लगाने की बात बताई। इलाज के दौरान महिला की मृत्यु हो गई। पुलिस ने महिला के बयान के आधार पर आरोपी पति मोहन पुत्र जीवन लोधी (37) और जेठानी लीला पति माधव उर्फ रेवन लोधी (52) के विरुद्ध धारा 302 का मामला पंजीबद्ध किया।
मामला न्यायालय के समक्ष आने पर अभियोजन ने अपने मामले को प्रमाणित करने के लिए सत्रह साक्षियो के कथन कराए। प्रकरण में घटना के समय मौजूद कोई भी साक्षी नहीं था। बचाव द्वारा न्यायालय को बताया गया कि प्रकरण में जो भी स्वतंत्र साक्षी हैं वह मृतिका के मायके वाले हैं। परंतु न्यायालय ने बचाव के इस तर्क को खारिज कर निर्णय में लिखा कि हाईकोर्ट के न्याय दृष्टांत रमेश विरुद्ध स्टेट ऑफ एमपी के अनुसार जहां तक सभी साक्षी की हितबद्धता का प्रश्न है, सिर्फ इस कारण उनकी साक्ष्य अविश्वनीय नही होती। बचाव पक्ष ने यह भी व्यक्त किया किया कि पुलिस और डाक्टर द्वारा लिए गए कथनों को मृत्युकालीन कथन नहीं माना जा सकता। बयान देने वाली महिला गांव की है। जबकि दोनो बयानों में भाषा सामान्य है। परंतु न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए बचाव पक्ष के इस तर्क को अमान्य कर निर्णय में लिखा कि जिन व्यक्तियों से आरोपियों की कोई रंजिश नही हो, वह क्यों झूठ कथन लिखेंगे और मात्र भाषा एवं उच्चारित शब्दों में अंतर एवं टीप संबंधी तत्व इतना महत्वपूर्ण नहीं है, जिससे मृतिका के मृत्युकालिक कथन की विश्वसनीयता लेश मात्र भी प्रभावित होती हो। अगर मृतिका को झूठा फसाना ही होता तो वह अपने दोनों मृत्युकालिक कथन में पति के जलने की बात भी छुपा लेती, परंतु उसने ऐसा नहीं किया। न्यायालय ने प्रकरण की संपूर्ण स्थिति और अभियोजक द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य एवं परिस्थितियों से सहमत होकर आरोपी मोहन एवं लीलाबाई को भादवि की धारा 302 में शेष सम्पूर्ण जीवन जेल में रहने एवं एक हजार रुपए के जुर्माना से दंडित किया है।
मृतिका एवं आरोपी की पुत्रियों से सहानुभूति

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