मार्च 17, 2026

रूक्मणी देवी नहीं गोमेद अंबिका देवी की प्रतिमा होगी स्थापित

दमोह। केंद्रीय मंत्री एवं दमोह सांसद ने रुक्मिणी देवी की प्रतिमा राधा अष्टमी को स्थापित करने का संकल्प लिया है। वहीं दूसरी ओर प्रतिमा के रुक्मिणी देवी होने को लेकर भी संदेह बना हुआ है।
जिले की प्रसिद्ध तीर्थ क्षेत्र कुंडलपुर से चोरी हुई माता रुक्मिणी देवी की पाषाण प्रतिमा को स्थापित करने को लेकर एक बार फिर से तैयारियां शुरू हो गई हैं। दमोह सांसद एवं केंद्रीय राज्य मंत्री प्रहलाद पटेल ने अपने निवास पर आयोजित एक बैठक में पुरातत्व संग्रहालय में रखी प्रतिमा को माता रूकमणि देवी की प्रतिमा बताते हुए उसे वापस मंदिर में स्थापित करने का संकल्प दोहराया है। बैठक में यह घोषणा की गई की श्री राधा अष्टमी 22 सितंबर को प्रतिमा स्थापित की जाएगी। अचरज की बात यह है कि हिंदू संगठन के लोग भी इस घोषणा से खुश हैं, और वह एक गलत निर्णय होते देख रहे हैं। दमोह जिले के इतिहास को जानने वाले और असली प्रतिमा के दर्शन कर चुके लोग यह बात भली-भांति जानते हैं कि पुरातत्व संग्रहालय में रखी प्रतिमा माता रुक्मिणी देवी की नहीं है। यह एक वर्ग विशेष की प्रतिमा है और प्रतिमा गोमेद अंबिका देवी की है। हिंदू संगठनों के अलावा जैन संप्रदाय के लोगों ने भी ज्ञापन देकर प्रतिमा मंदिर में वापस स्थापित करने की मांग की थी। अब सवाल यह उठता है कि क्या संग्रहालय में रखी प्रतिमा ही असली प्रतिमा है। आपको बताते चलें की माता रुक्मिणी देवी की सिंगल पाषाण प्रतिमा थी। उनके साथ भगवान श्री कृष्णा नहीं थे। जो प्रतिमा संग्रहालय में रखी है वह युगल प्रतिमा है। अब सवाल यह भी उठता है कि केंद्रीय मंत्री सब कुछ जानते हुए भी आखिर यह कदम क्यों उठा रहे हैं? क्या उन्हें हिंदूवादी संगठनों और सनातनियों की जरा भी परवाह नहीं है? जो लोग बैठक में थे उनमें से अधिकांश लोग यह जानते हैं की प्रतिमा रुक्मिणी देवी की नहीं है। उसके बाद भी केंद्रीय मंत्री के डर के कारण वह खुलकर नहीं बोल सके। क्या इस प्रतिमा का रखा जाना उचित है? क्या यह सनातनियों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं है। आखिर केंद्रीय मंत्री गोमेद अंबिका की प्रतिमा को रुक्मिणी देवी की प्रतिमा बताकर कर मंदिर में स्थापित करने पर क्यों आमादा है? हिंदू संगठन के लोग इस नाजायज निर्णय को मानने के लिए क्यों बाध्य हैं। वह क्यों नहीं इस बात का खुलकर विरोध करते की यदि यह प्रतिमा स्थापित कर दी गई तो भविष्य में इसके दुष्परिणाम भी सभी को भुगतने होंगे। किसी मंदिर में यदि एक बार किसी भी देवी देवता की प्रतिमा स्थापित हो जाती है तो उसे वापस वहां से नहीं हटाया जा सकता। यदि यह प्रतिमा स्थापित हो गई और भविष्य में माता रुक्मणी की असली प्रतिमा मिल जाती है और उसे वहां पर स्थापित करने के प्रयास किए जाएंगे तो इससे निश्चित रूप से एक भयंकर सांप्रदायिक तनाव उपजेगा और उसका जिम्मेदार कौन होगा। इस पर भी हिंदू सनातनियों को विचार करना चाहिए। जब इस खबर के लेखक ने एएसआई के एक सर्वेयर इस संबंध में बात की तो उन्होंने बताया कि यह प्रतिमा रुक्मिणी देवी की नहीं है। प्रतिमा गोमेद अंबिका की है। इस संबंध में लेखक ने केंद्रीय मंत्री को भी पूर्व में अवगत करा दिया था लेकिन उसके बाद भी वह सब कुछ जानते हुए भी यह कार्य करने जा रहे हैं। यह हिंदू सनातनियों की भावनाओं से खिलवाड़ है। लेखक ने स्वयं प्रतिमा चोरी होने के पूर्व जब कुंडलपुर में महामस्तकाभिषेक चल रहा था उसे दौरान माता रूकमणि देवी की असल प्रतिमा की दर्शन किए थे।

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