June 5, 2026

साहब को शराबियों का दर्द दिखा, पर स्कूल में लुटते बच्चों की चीख नहीं सुनाई दी!

दमोह. दमोह कलेक्टर की कार्य प्रणाली पर अब सवाल खड़े होने लगे हैं. उन्हें किसानों के साथ शराबियों की तो बहुत चिंता है लेकिन हजारों मासूमों की चिंता नहीं है जो स्कूलों में लुट रहे हैं.
हाल ही में दमोह कलेक्टर प्रताप नारायण यादव पर हाई कोर्ट के एक आदेश के बाद एक शराब दुकान पर की गई कार्रवाई को लेकर शहर में खूब चर्चाएं हो रही है. लेकिन कहीं कहीं इस कार्रवाई को लेकर सवाल भी खड़े हो रहे हैं. आखिर ऐसी क्या वजह है कि इस कार्रवाई को लेकर लोग सवाल खड़े कर रहे हैं. दरअसल कलेक्टर श्री यादव ने कहा था कि सोशल मीडिया पर उन्हें बहुत शिकायतें प्राप्त हुई थी जिसके बाद उन्होंने हटा नाका स्थित एक अंग्रेजी शराब दुकान पर जाकर खुद जांच की. इसके पहले उन्होंने अपने अधीनस्थ आबकारी विभाग के अधिकारियों को कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे. लेकिन उन्होंने कोई संतोषजनक कार्रवाई नहीं की. जिसके बाद कलेक्टर को खुद ही मैदान में उतरना पड़ा. ताज्जुब की बात है कि जिले के एक मुखिया के आदेश को आबकारी विभाग के अधिकारी ठेंगा दिखा रहे हैं. इसका सीधा सा अर्थ है कि वह कलेक्टर की बात को ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहे हैं ? या फिर यह कहें कि कलेक्टर महोदय खुद ही नहीं चाहते कि उनकी बात को तवज्जो दी जाए. अन्यथा शराब दुकान से पहले अधिकारियों पर ही कार्रवाई कर दी जाती. अब सवाल यह उठता है कि क्या सोशल मीडिया पर महंगे दाम में शराब बिकने या नियम विरुद्ध तरीके से दुकान का संचालन किए जाने की शिकायत मिलने के बाद यह कार्रवाई की गई है, तो शायद यह बात पूरी तरह सच नहीं है. दरअसल हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए करते हुए निर्देश दिए थे कि 15 दिन के भीतर शराब दुकान की जांच कर कार्रवाई की जाए. इसके पूर्व कई बार समर्थन मूल्य केंद्रों पर कलेक्टर पहुंचे और उन्होंने अनाधिकृत रूप से उगाही करने वाले सर्वेयर और समिति मैनेजर पर कड़ी कार्रवाई की. उनका स्पष्ट मानना है कि किसानों का किसी भी हालत में शोषण नहीं होने दिया जाएगा. कलेक्टर का यह मानवीय चेहरा वाकई सराहनीय है. लेकिन उन्हें शराबियों की भी इतनी चिंता है कि शराबी महंगे दाम पर शराब लेकर क्यों पिए उन्हें सस्ती शराब मिलना चाहिए ? लोगों को यह बात पच नहीं रही है. क्योंकि जिस जिले में महंगे दामों पर शराब बिकने की चर्चा पर दुकान पर कार्रवाई कर दी जाए उसी जिले में जब किसान मजदूर और मध्यम वर्गीय परिवारों के सीबीएसई स्कूलों में पढ़ने वाले करीब 50 हज़ार से अधिक बच्चों की अनदेखी की जाए ? जी हां कलेक्टर को शराबियों की बहुत चिंता है, किसानों की भी चिंता है ? लेकिन उन्हीं किसानों के जो बच्चे सीबीएसई स्कूल में पढ़ रहे हैं वहां पर बिल्कुल भी कलेक्टर का ध्यान नहीं है. दरअसल यह सीबीएसई स्कूल हाई कोर्ट के आदेश की आड़ लेकर मनमाने तरीके से केंद्रीय शिक्षा नीति के विरुद्ध किताबें चला रहे हैं, और वह किताबें कुछ विशेष दुकानों पर बहुत ही महंगे दामों में बेची जा रही हैं. जबकि हाई कोर्ट का ऐसा कोई आदेश अभी तक शिक्षण संस्थान सामने नहीं ला पाए हैं, और इन शिक्षण संस्थानों में से अधिकांश ने अपने पोर्टल पर जो किताबें चलाई जा रही है उनकी जानकारी भी अपलोड नहीं की है. जबकि यह स्पष्ट नियम है की एनसीईआरटी की किताबें चलाई जाए और उनकी जानकारी या जो भी किताबें चलाई जा रही है उनकी जानकारी वह अपने पोर्टल पर अपलोड करें. ताकि उसे हर व्यक्ति देख सके. लेकिन हजारों की संख्या में जहां बच्चों से महंगी किताबें खरीदवाई जा रही हैं उस और कलेक्टर का ध्यान क्यों नहीं है ? क्या कलेक्टर खुद ध्यान देना नहीं चाहते या फिर वह इस झंझट में पड़ना नहीं चाहते. समर्थन मूल्य केंद्रों पर किसानों के 500 -1000 रुपए तो बचा लिए लेकिन कई हजार रुपए देकर जहां किसान लूट रहे हैं उन स्कूलों पर कलेक्टर की कलम क्यों नहीं चल रही है.

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